Wednesday, February 29, 2012

जीवन एक सुन्दर प्रवाह - "अहम् ब्रह्मास्मि"

मेरे प्रियजनो,
हम समय के साथ-साथ प्रवाह
में बहते जाते है। एक बच्चा एक युवा में विकसित होता है, एक युवा वयस्क में विकसित होता है, एक वयस्क बुढ़ापे मे... बुढ़ापे मे इन्सान लगभग एक बच्चे की तरह हो जाता है और अंत में गुजर जाता है।

याने, हम एक असहाय्य बच्चे के रूप में हमारे जीवन की यात्रा शुरू करते हैं और एक असहाय्य बच्चे की तरह हमारी यात्रा का अंत भी हो जाता है। बचपन लाचार होता एक बच्चे को दूसरों से सहायता, समर्थन, सुरक्षा की जरूरत होती है। इसी तरह एक बूढ़े व्यक्ति को भी सहायता, सुरक्षा की जरूरत होती है।

आप पर जब भी अहंकार हावी हो जाये, उसकी विकृति जीवन पर छाने लगे तो, इस बात का ध्यान रखना की, एक दिन मेरा भी बुढ़ापा आयेगा, मुझे भी किसीके सहारे की जरुरत पड़ेगी... किसीके ऊपर निर्भर होना पड़ेगा, चाहे हमें पसंद हो या नहीं। इसलिए, सभीसे प्यार करो, सभी की मदत करो। जब आप बिना किसी मोह से या बीना किसी अपेक्षा से प्यार और सेवा करते हैं, तो दुनिया भी बिना किसी अपेक्षा से आपकी सेवा करती है, मदत करती है।

अगर भगवान ने हमें घर, भोजन, प्यार करनेवाले लोग और अच्छा स्वाथ्य दिया है तो इसके लिए दिल से उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए, उसके आभारी होना चाहिए। हमेशा उसका आभार व्यक्त करते रहना चाहिए.... सच्ची प्रार्थना वोही है जिसमे हमें जो भी मिला है उसके लिए दिल से आभार प्रकट हो, उस भगवन से बस कृतज्ञता से कहना कि, "धन्यवाद प्रभु हर उस चीज के लिए जो तुने मुझे दी है!!"

भगवान से कुछ भी पूछने की या मांगने की जरुरत नहीं होती। ईश्वर तो सर्वव्यापी है और वो जानता है कि तुम्हारी जरूरत क्या है। कृतज्ञता का रवैया रखने से, प्रार्थना करने से हमारी समृध्ही बढाती है, जब की कृतज्ञता खो जाने से, हम खुद को ही खो देते है

अध्यात्मिक मार्ग पर, आध्यात्म में हम आगे तभी बढ़ पाते है जब हम हर चीज और हर व्यक्ति के लिए कृतज्ञता की भावना रखते है। आध्यात्म धर्म के बारे में नहीं होता, यह तो सभी धर्मों से परे होता है आध्यात्म अनुष्ठानों के बारे में भी नहीं होता, यह सभी पूजा, अर्चना, अनुष्ठानों से भी परे है। आध्यात्म गुरु या किसी पंथ के बारे में नहीं है, यह सभी गुरुओं और सभी पन्थो से परे है। आध्यात्मिकता अपनी आत्मा, अपने असली, शुध्ह रूपसे, सारांश से संबंधित है। यह सार्वभौमिक और सभी मानव निर्मित बाधाओं से परे है।

कुछ भी हमारा अपना नहीं है, ना ही हमेशा के लिए है, यहां तक ​​कि हमारे रिश्ते नाते, घर-द्वार, पैसा। सब कुछ आता है और चला जाता है। बस जिंदगी इस पल मे है, इस पल का आनंद लें और हर पल का आनंद लेते रहे।
याद रखे, जब हम दूसरों की आलोचना करते हैं तो हमारे भीतर का स्तर/अंतरिक्ष दूषित हो जाता है। जब हम लोगों को हमारे सीमित दृष्टिकोण का उपयोग करके अलग-अलग व्यवहार देते है, किसीको बड़ा या छोटा समज़ते है, ताड़ते है, तो हमारे कर्मो की पोटली मे और कई कर्म जमा हो जाते है। जब आप किसीको गुस्से से अपमानित करते है, किसीको किसी कांड मे फसाते है तो उसकी तुलना में आप को बहोत जादा कुछ भुगतना पड़ता है।

आध्यात्मिक विकास मे, हजारो सालो की साधना करके कमाया हुवा पुण्य भी नकारात्मक शब्दों से, भावना से, गुस्से से हमारे हाथ से निकल जाता है।

हर एक जन्म मे हमें अपने बुरे कर्मो से छुटकारा पाना चाहिए, अच्छे कर्म करके, ज्ञान प्राप्त करके, प्रत्येक मानव जन्म मे हमें कर्मो की पोटली खाली करनी चाहिए. मौन और शांति की ऐसी ऊंचाई पर पहुचना चाहिए की, जहां आप खुद को विकसित कर सके, ध्यान और योग की अवस्था का एहसास कर सके और अद्वैत का मतलब जान सके की "अहम् ब्रह्मास्मि" "मै और मेरे पिता (इश्वर) एक ही हैं।"

जब हम दूसरों के बारे में बुरी बात करते है, या किसीका बुरा करते है तो कई जन्मों तक वह कर्म मिट नहीं पाते और हो सकता है की हम भी किसी असहनीय और भारी परीस्थितियों से गुजरे। हम अपना भाग्य खुद बनाते है। इसलिए, हम हमारे भीतर के स्तर (आत्मा) को हमेशा शुध्ह रखे, अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध और घृणा से हमेशा दूर रहे। सावधानी से अपने आप को उससे बचाए

हमारी आत्मा ही हमारी सच्ची संपत्ति है बाकि सभी बाहरी दुनिया तो क्षणभंगुर हैं। वोह साथ छोड़ जाती है, अभी या बाद में, अपने भीतर की आत्मा ही अपना असली धन है। अपनी आत्मा हमेशा साफ, स्वच्छ और सुन्दर रखें। अन्दर से हमेशा हम चमकदार और सुंदर हो, एक सुंदर आंतरिक मन/अंतरिक्ष ही एक सुंदर जीवन को सुनिश्चित करता है।

यदि आप अपने सबसे बड़े दु:ख के दौरान भी दिल से मुस्कुरा रहें है, तो आपका पूरा जीवन खुशियों से भर जाएगा. कभी किसी भी दूषित भावना को, दूषित विचार को किसी भी तरह अपने भीतर, अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं करने देना. इसके बजाय दूसरों की मदद करके अपने आंतरिक अंतरिक्ष का कचरा हटाने के लिए प्रयत्न करना.

अगर आप अधिक जागरूक होकर और अच्छे मार्गदर्शन का उपयोग करके अन्दर की दूषण, कचरा साफ करते है, और अहंकार, लोभ-मोह, क्रोध से दूर रह्ते और दूसरों की मदत करते है तो आप का जीवन सुन्दर बन जायेगा...

आज मे ही जिंदगी है, आज मे जियो, सबसे प्यार करो, प्यार करते रहो... बस तुम्हारी अडिग श्रद्धा, विश्वास और अविरत अच्छे कर्म तुम्हारा भविष्य अच्छा बनायेंगे ....सुन्दर बनायेंगे....

मैं हर कदम मे तुम्हारे साथ हूँ, हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा..

में आपको असीम प्यार करता हूँ....